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हिन्दी कविताएँ

निज का विस्तार

निज के विस्तार के लिए एकांत आवश्यक है लंबी साँस के लिए खुला आसमान आवश्यक है

कुछ पल के लिए ही सही विचार शून्य हो जाना है
सब को भूलना है और निज के पार निकल जाना है

मूंदों  आँखें और करो आभास
लेटे हो तुम किसी सागर के पास

ना कोई है ना होने का अहसास
सायद सुन पा रहे हो अपनी श्वास 

जब तुम हो, संग है लहरों की आवाज़ और खुला आकाश
वह क्षण स्वतः आएगा, जब कुछ भी न होगा मन के पास   

कुछ भी ना होगा अहसास, कि हुआ है कुछ ख़ास
तुम उठोगे अनायास, पुनः लौट जाओगे सब के पास

कहीं कभी दूर बैठे उस पल की स्मृति मनः स्थल पे आएगी
स्वतः ही एक मुस्कान, तुम्हारी आत्मा को तृप्त कर जाएगी 

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राम का सहारा

कुछ बड़ा कर गुजरने की चाह में
भटकते रहता है तू इस जग की राह में।

जब तू ऊपर उठता है पीछे सब कुछ छूटता है
तब तू राम से मिलता है जो भीतर तेरे बस्ता है।

“राम” तो बस नाम है, पर नाम के होते बड़े काम है
बिना नाम के तू उसे कैसे जानेगा,
जो तेरे भीतर है उसे कैसे पहचानेगा।

मूँद नैन और देख भीतर, सब कुछ वहां पायेगा
जो कुछ वहां ना है, वह किसी काम भी नहीं आएगा।

ले राम का सहारा
यह जग होगा तुम्हारा
हर चाह का होगा निस्तारा
तर जाएगा यह संसारा।

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चलती है गाड़ी और जब नींद आती है

चलती है गाड़ी और जब नींद आती है,
सोचता हूँ मंजिल पे पहुंच के सो जाऊँगा

चलते चलते और ज्यूँ फासला कम होता है,
नींद तो खोती है और लगता मैं भी कहीं खो जाऊँग

हम मुकाम पे पहुंचे पर सुकून ना आया
जब हमने अपनी मंजिल को वहां ना पाया

सुनते आये थे, रास्तों का मज़ा लेना राही
पर हमें तो रास्तो पे चलना ही ना आया

हम अपने ही ख्यालों के तल्ले दबते चले जा रहे हैं
हमारे ख्याल ही हमें निगलते चले जा रहे हैं।

कभी खुशनुमा, कभी गमगीन राह पे रही मिलते है।
ख्वाबों के बोज के तले कितने दम निकलते है।

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अंधियारे से उजाले की ओर

अंदर है अँधियारा, दिया दिखा दे कोई,
सहमा है संसार ढांढस बन्धा दे कोई।

सायद फिर अँधियारा भी मुझको न खाएगा
जब कुछ भी अलग होने का भेद मिट जाएगा।

क्या भला अंधियारे से और साधन है सरे भेद मिटने को
और सब तो क्या, निज को भी राह से हटाने को।

जब भाव-तिमिर घोर भीतर छाएगा
तब ही तो सायद अंधकार मिट पायेगा।

वहां प्रकाश अतप्त, निरन्तर, निर्विकार होगा
जहाँ सहज भाव से निज का विस्तार होगा।

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तेरी राह पे

बुद्धि का बेरंग होना, ना सफ़ेद ना काला
हृदय का निष्काम होना, हो जाना मतवाला।

शुद्धि का क्रम होता है, निज से निज का अलगाना
मैं का निराकार होना, और तुज में खो जाना।

प्रेम में नहीं कोई दूजा, किससे मोह मिलाना
जब और ना कोई सुजा, हुआ तुजसे मिलपाना।

ना हाला, ना बाला, ना निवाला, बस हो तेरा हवाला
पहुंचु उस मुकाम पे जहाँ सब कुछ हो निराला।

भक्ति का सकाम होना, बुद्धि का मिट जाना
तेरी राह पे चल पड़ना और बस खो जाना।

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हाल ई दिल

हम चलते ही रहे और कहीं पहुंचे भी नहीं,
तो हमने चलने को ही अपना मुक़द्दर समझ लिया।

शिकायत किसी और से कभी की भी नहीं,
हाल-ई-दिल खुद का खुद से बयां कर लिया।

हमारी बदनवाज़ी ने उन्हें रूला दिया होगा
इस इल्म से हम सहम जातें है।

अपनी बदसुलूकी को पर्दा देने के जतोजहद में
हम उन्हें तारतार कर आतें है।

ना हिंदी आती है ना उर्दू आती है,
जबा के है हम फ़क़ीर हमें बस हालेदिल बयां करने की हूक आती है.

ना रोना आता है ना हंसना आता है,
सबा के है हम मुरीद, ख्वाब नहीं मुकमल हमारे क्यूंकि बहुत कम हमें नींद आती है.

उठके चल दिए थे, बेदिली में हम भी महफ़िल से
जो पास-ए-अदब से थे, अब हाथ धो बैठे हैं शर्म-ओ-हया से

उन्होंने कहलवाया, अपना किरदार तो अदा करो
जब मरोगे तो मरोगे ही, जबतक जिन्दा हो तर्ज़-ए-जफ़ा न करो