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हिन्दी कविताएँ

चलती है गाड़ी और जब नींद आती है

चलती है गाड़ी और जब नींद आती है,
सोचता हूँ मंजिल पे पहुंच के सो जाऊँगा

चलते चलते और ज्यूँ फासला कम होता है,
नींद तो खोती है और लगता मैं भी कहीं खो जाऊँग

हम मुकाम पे पहुंचे पर सुकून ना आया
जब हमने अपनी मंजिल को वहां ना पाया

सुनते आये थे, रास्तों का मज़ा लेना राही
पर हमें तो रास्तो पे चलना ही ना आया

हम अपने ही ख्यालों के तल्ले दबते चले जा रहे हैं
हमारे ख्याल ही हमें निगलते चले जा रहे हैं।

कभी खुशनुमा, कभी गमगीन राह पे रही मिलते है।
ख्वाबों के बोज के तले कितने दम निकलते है।

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